Hi friends,
आक्रोश कई दिनों से था - लगातार हो रही हिंसा के प्रति भी और मानव के बदलते चरित्र के प्रति भी। लगभग ७५ लोग मारे जाते हैं और मारने वाले घरियाली आंसू बहाते हैं। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ CRPF पर हुए माओवादियों के हमले की। कुछ व्यक्तिगत व्यस्तताएं थी, या सायद उनका बहाना था, इसलिए चाहकर भी पहले कुछ लिख नहीं पाया। आज भी सायद ही बहुत कुछ लिख पाऊँ, लेकिन फिर भी अब खुद को आपने आक्रोश को अभिव्यक्त करने से रोक नहीं पा रहा। लेकिन सायद अच्हा ही हुआ, क्योंकि अगर मैं पहले लिखता तो मेरे विचार प्रासंगिक कम और गुस्से से भरे आधिक होते। अब जब आक्रोश कुछ कम हो चूका है तो मुझे ऐसा लगता है की हमे इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि आज जरूरत नाक्साल्वाद को कानून व्यवस्ता कि समस्या के रूप में देखने कि है। साथ ही यह अवसर है हमारे पुलिस को आधिक बेहतर बनाने का, उनको आधिक people-friendly बनाने का, उनको अधिक बेहतर ट्रेंनिंग देने का और उनको वास्तव में जनता का रक्षक बनाने का। इन सबके अलावा यह अवसर है भारत और इंडिया कि दुरी को पाटने का ताकि हमारे वंचित भाई नक्सालियों के चारे न बन जाएँ।
घरी कि सुइयां इशारा कर रही हैं कि मैं खुद को रोक लूं। कल का दिन सायद मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण हो और जिंदगी कि दिसा निर्धारित करे। आसा रखता हूँ कि कल जब वापस ब्लॉग पर आऊँगा तो नक्सालियों के प्रति भले ही आक्रोश हो खुद के प्रति उत्साह होगा। नए सवेरे कि आसा के साथ ............................
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