Wednesday, November 27, 2019

Ghanshyam Das Birla’s Letter to his son Bansant Kumar Birla

घनश्यामदास जी बिड़ला का अपने पुत्र बसंत कुमार जी बिड़ला के नाम 1934 में लिखित एक अत्यंत प्रेरक पत्र. 
चिबसंत…..
यह जो लिखता हूँ उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़नाअपने अनुभव की बात कहता हूँ।संसार में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग कियावह पशु है।तुम्हारे पास धन हैतन्दुरुस्ती हैअच्छे साधन हैंउनको सेवा के लिए उपयोग कियातब तो साधन सफल है अन्यथा वे शैतान के औजार हैं तुम इन बातों को ध्यान में रखना।धन का मौज-शौक में कभी उपयोग  करनाऐसा नहीं की धन सदा रहेगा हीइसलिए जितने दिन पास में है उसका उपयोग सेवा के लिए करोअपने ऊपर कम से कम खर्च करोबाकी जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो।
धन शक्ति हैइस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव हैइसका ध्यान रखो की अपने धन के उपयोग से किसी पर अन्याय ना हो।अपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोड़कर जाओ। यदि बच्चे मौज-शौकऐश-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और हमारे व्यापार को चौपट करेंगे।ऐसे नालायकों को धन कभी  देनाउनके हाथ में जाये उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम में लगा देना या गरीबों में बाँट देना।तुम उसे अपने मन के अंधेपन से संतान के मोह में स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं कर सकते।हम भाइयों ने अपार मेहनत से व्यापार को बढ़ाया है तो यह समझकर कि वे लोग धन का सदुपयोग करेंगे। 
भगवान को कभी  भूलना,वह अच्छी बुद्धि देता है,इन्द्रियों पर काबू रखनावरना यह तुम्हें डुबो देगी।
नित्य नियम से व्यायाम-योग करना। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी सम्पदा है। स्वास्थ्य से कार्य में कुशलता आती हैकुशलता से कार्यसिद्धिऔर कार्यसिद्धि से समृद्धि आती है lसुख-समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है l मैंने देखा है की स्वास्थ्य सम्पदा से रहित होनेपर करोड़ों-अरबों के स्वामी भी कैसे दीन-हीन बनकर रह जाते हैं स्वास्थ्य के अभाव में सुख-साधनों का कोई मूल्य नहीं। इस सम्पदा की रक्षा हर उपाय से करना।भोजन को दवा समझकर खाना। स्वाद के वश होकर खाते मत रहना। जीने के लिए खाना हैं कि खाने के लिए जीना 
घनश्यामदास बिड़ला

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