Saturday, October 17, 2009

Hi Friends,
आप सबको दीपावली की ढेर सारी सुभकामनाएँ। पर ये पर्व सिर्फ़ उल्लास या उत्सव के मौके ही नही कुछ याद करने के अवसर भी हैं। मैं भी इस पर्व के बहाने कुछ कठिन सवाल उठाना चाहता हूँ ताकि बदलाव कि चिरंतन प्रक्रिया में कम से कम अपनी सम्वेधना के माध्यम से योग दे सकूं।
हम सब न जाने कितनी शताब्दियों से दीपावली मना रहे हैं, पर क्या अँधेरा मिटा है? अँधेरा अब भी है , गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, आतंकवाद, हिंसा, अभाव के कारन होने वाली मौत, जैसी न जाने कितनी समस्याओं के रूप में। ऐसे में जब हम दिवाली पर उल्लास मनाएं तो यह याद रखना भी जरुरी है कि हम सब की भी जिम्मेवारी है कि हम सब अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार इस अंधेरे को मिटाने में अपना अपना योगदान दे ताकि हमारे उन भाईयों के हिस्से भी कुछ प्रकाश आ सके जिन्होंने कभी दिवाली नही मनाई है। आज हम सब संकल्प ले कि हम प्रेम को अपने जीवन मूल्य के रूप में अपनाएंगे और अपनी क्षमताओं का एक छोटा सा हिस्सा और अपनी संवेदनाओं का एक छोटा सा भाग गाँधी के अन्तिम वैयक्ति के लिए भी बचा कर रखेंगे। शायद नीरज कि कुछ पंक्तियाँ मेरी भावनाओं को शब्द दे पा रही हों-
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी
मनुजता नही पूर्ण तब तक बनेगी
कि जब तक लहू के किए भूमि प्यासी
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कही रह न जाए।




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