Hi friends
किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे दुखद होता है उसके पास भावनाओं को अभिव्यक्त करने की योग्यता का न होना। मैं खुद को इतना दुर्भाग्यसाली तो नही मानता लेकिन फिर भी कई बार ऐसा होता है कि मैं चाह कर भी अपनी भावनाओं को लोगों तक नही पंहुचा पता। ऐसे में पीरा तो होती ही है। सायद कुछ दिनों से मैं इसी पीरा को झेल रहा हूँ, क्योंकि मैंने पिछले कुछ दिनों से, अपने आलस्य के कारन ब्लॉग पर कुछ भी खास नही लिखा है। ख़ैर, जो भी हो, इस बार जब मैं वापस आया हूँ तो इस संकल्प के साथ कि इस का प्रयोग अनवरत करूंगा। इस बार मैं निरंतरता का कोई वादा तो नही करूंगा लकिन मेरा प्रयास होगा कि मैं आपसे निरंतर जूरा रहूँ, सम्भव हो तो खुद अपनी लेखनी के साथ, अगर सम्भव न हो तो किसी और के विचारों के साथ,पर उसी भाव के साथ जो हम सबको प्रेरित करती है, उसी आग के साथ जो हम सबसे मांग करती है- बदलाव कि अनवरत प्रक्रिया में सकराक्मत योगदान देने की। उम्मीद करता हूँ कि नीचे कि कुछ पंख्कियाँ मेरी पीरा को अभिवयक्त कर पाएँगी ---
अनुभूति अगर अभिवयक्त करुँ जब भी यह अवसर आता है
मेरे संचित सब्धों का स्वर गूंगा सा हो जाता है
अर्थहीन कितनी ही बातें इन अधरों पर आती हैं
अर्थभरी कितनी ही बातें अनकही रह जाती हैं
Waiting for your reply.
Friday, August 28, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment